||असलियत||

बदलते मौसम जैसी इन मौहब्तों को

कितने लोग असल में जानते पहचानते हैं,

सुराहियों में कैद कुईयांओ का पानी

कितने लोग पीने से पहले खूब छानते हैं,

यकीन का सलीबी सच ही है अंधापन

आशिक कब लकीरे तकदीरी बांचते हैं,

वक्त के साथ ठंडा होता है इश्के तूफान

कितने लोग दौरे उफान गरमी नापते हैं,

शर्तों की बिसात है ही दिमागी तिजारत

बर्फीले पहाड क्या धूल भी पहचानते हैं,

तासीर के मुताबिक खेलना है मुनासिब

दरिया क्या कभी अपने किनारे लांघते हैं,

आईनों की औकात पर मत उठाओ सवाल

बेजुबान पत्थर भी हश्रे जुबांतराशी जानते हैं।

“PKVishvamitra”

बदलाव

बुढाती उम्र के झरोखे के उस पार,

कौन है एक खालीपन के अलावा,

सुबह भी है वैसी ही धुंधली धुंलली,

जैसे रात की कालिमा थी उल्टा तवा,

छडी कंपकपाती है बदन के बोझ में

महसूस होती है ठहरी ठहरी सी हवा,

छिपेगा दिन तो क्या सुबह भी आयेगी,

ओसी सुबह बदलेगी जरूर आबोहवा।

“P.K.Vishvamitra”

Across the window of old age,

In addition to an emptiness,

Morning blurred fog,

Like the night Kalima was in the upside down,

The rod is shivering in the burden of body

Feel the cold air,

Will you hide the day, whether it will come in the morning,

OC will change in the morning, definitely the climate.