Reality!!/हकीकत!!

आईने भी हो गये हैं तमाम ही फिजूल अब तो

चेहरे की बुढाती हुई हालत को चिढाया करते हैं,

देखना चाहता था उनमें अपनी औकाते अदम

कम्बख्त हमेशा हकीकी सच्चाई छिपाया करते हैं,

खुद ही थी खुद को परखने की वो तमाम कोशिशें

अधूरे अरमानों को बनाकर गीत गुनगुनाया करते हैं,

इधर से चले थे उधर पहुंचकर फिर इधर ही आ गये

डबडबाती आंखों में निशाने जख्म छिपाया करते हैं,

एक पुरानी सी किताब समझकर टटोलते हैं अजीज

अश्कों की टपक से भीगा हुआ बरखा पाया करते हैं,

बस्तियां बदल गयी हैं चौराहे हुए हैं सभी अजनबी से

भीड में होकर भी मौजूद खुद को तन्हां पाया करते हैं,

समझ बदली सोच बदली ख्याला भी बदले हैं तमाम

नये जमाने की भूलभूलैंया में यूंही रास्ता जाया करते हैं,

बेमुरव्वत आईने भी तो नहीं बदल पाये हैं अपनी जात

फालतू में हम भी तो जिद के शिकार बन जाया करते हैं,

रास्ते भी रहेंगे यहीं और मंजिले भी ऐसे ही यहीं रहेंगी

मंजिल पर पाने की हवस में मुसाफिर मिट जाया करते हैं,

अब मत खोलना मेरे बीते हुए कल का कोई भी परचा

बदलते हुए मौसम की तरह मुकाम बदल जाया करते हैं।।

Reality!!

Even the mirrors have become so fragile that now
In the face of the face of the face, 
Wanted to see them 
Humiliation always hides the truth of truth, 
It was itself that all of the efforts to test themselves 
Make songs incomplete by making incomplete Armanas, 
They came from here and came here again 
Scary eyes hide the scars in the eyes, 
Aziz as a chronic book 
The dried sesame seeds are found to be dried, 
Settlements have been changed, crossroads have been made from all strangers 
Being present in the crowd, we find myself sheltered, 
Understanding changed thinking changed Khali also have changed 
In the new-age labyrinth, they go the way, 
Unimportant mirrors have not even changed their caste 
In spite of this, we also become victims of insolence, 
There will be stays here and the floor will remain the same here. 
To get to the floor, the passengers are wiped out, 
Do not open any tomorrow of tomorrow 
As the changing season, the elements change. 
“Pkvishvamitra”

16 विचार “Reality!!/हकीकत!!&rdquo पर;

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