12 खाते और 2 लाख करोड का कर्ज?.

महाराष्ट्र/पंजाब/मध्यप्रदेश/तमिलनाडू/यूपी के किसानों की तरह अन्य प्रदेशों का भी किसान भारत सरकार की उपेक्षा का शिकार है जिसका परिणाम यह है कि कृषि का व्यवस्थागत ढांचा दरक रहा है और किसान कर्जे के बोझ में दबकर आत्यहत्या जैसा कदम उठा रहे हैं,कृषिगत ढांचा को व्यवस्थित करने के लिए सरकारी सहयोग अनिवार्य आवश्यकता बन गया है किन्तु सरकार संभवतः कृषि व्यवस्था और कृषक को निपटाने के एजेंडे पर काम कर रही है इसीलिए किसान के हिस्से में चुनावी वायदों की टालू टॉफी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं आया है,सरकार की उपेक्षा/जुमलाई चुनावी वायदे और जीने लायक स्थितियों का अभाव किसान आंदोलन तथा किसानों की आत्महत्याओं के रूप में सामने आ रहा है,सरकार कॉरपोरेट हस्तियों का ऋण माफ करने में कर्तव्य निर्वहनता का अनुभव कर रही है तथा कृषक ऋण माफी योजना के संदर्भ में देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने का स्वांग कर भी रही है तथा प्रमुख बैंक संस्थानों से करा भी रही है,मध्यप्रदेश में उग्र होते आंदोलन को कुचल देने के लिए फायरिंग करायी गयी जिसमें 8 किसान मारे गये हैं,अधिकांश प्रदेशों से किसानों की आत्महत्याओं की सूचना प्रत्येक दिन प्राप्त हो रही है,सरकार कर्तव्यविमूढ स्थिति में मूक दर्शक बनी हुई है,RBI के हालिया ब्यान से मालूम हुआ है कि कुल 12 खाते ने बैंकों का 2 लाख करोड रूपया हजम कर रखा है जिसकी वसूली संभव नहीं है,इसका अर्थ यही है कि कृषिगत ढांचे को बचाने के लिए सरकार के पास धन नहीं है,बैंको से सम्बन्धों का लाभ उठाकर एक दर्जन लोग व्यवस्था को गडढे में धकेल चुके हैं,यह गम्भीर आर्थिक अपराध है जिसे बैंकों और बकायादारों ने योजनाबद्ध तरीके अंजाम दिया है,आश्चर्य इसके पश्चात भी सरकार इस पैसे को बट्टे खाते में डालने के अलावा कुछ नहीं करेगी?,सरकार यह दृष्टिकोण बकायादारों/बैंकों के साथ इस आर्थिक अपराध में शामिल हो जाना ही तो होगा?.