फस्ले गुल!

फस्ल-ऐ-गुल की चाहत है किसका हक-ऐ-सबब यह भी तो जान लीजिये,
कुछ रास्तों की हैं मंजिल-ऐ-मकसूद गडढे बजरिये अक्ल पहचान लीजिये,
आईनों की फितरत है सच्चाई का दामन थामे रहना घर के किसी कोने में लगा लीजिये,
हर चेहरे पर बनावटी चेहरे की नकाब है कडवा सच यह राज-ऐ-पोशीदा जान लीजिये,
तराजू के पलडे में पासंग है दुनियादारी रवायतें यह समझने के लिए उसकी डंडी थाम लीजिये,
तुख्म की तासीर है कुदरती तयशुदा असर वक्त-ऐ-नाक़िस में इसे बखूबी जांच लीजिये,
बंजर पडी जमीनें हैं हक-ऐ-खरपतवार बेपरवाह क्यारियों को ठीक से संवार लीजिये,
बदलते मौसम की ब्यार है वक्त-ऐ-पतझड भी दिल को मजबूती से संभाल लीजिये,
फिर से आयेंगी वही पुरसुकूँ बहारें लौटकर चमन में बस फस्ले गुल के ख्वाब पाल लीजिये।-PKVishvamitra

सवाल!!

तपती दोपहर में पत्थर तोडते मेरे हाथों ने कब

पत्थरों के ढेर में तुम्हारी बुलन्द हवेलियों का नक्शा टटोला है,

ढलती शाम के धुंधलके में थकान से लडखडाते हुए

घर की चौखट पकडने की तलब ने जिंदगी का राज खोला है,

तकदीर और तदबीर के खेल किसके हैं क्यास

जीने के लिए मरना और मरने के लिए जीना जिंदगी माना है,

मंदिरों मस्जिदों गुरूद्वारों गिरजाघरों में है भले ही भीड

रोटी की जुस्तजू में उठते कदमों ने कब बन्दगी को जाना है,

पसन्द नापसन्द के चौंचलों की बपौतियों से आजादी

नून घाली रोटी गुड गटटे के साथ ठंडा पानी सुकून दे देता है,

नरम मुलायम बिस्तरों पर बेचैन करवटों का सिलसिला

थकान से कुबडाई गयी कमर को झिंगला कैसे नींद दे देता है,

अमीरी की हनक से उपजी गरीबों के लिए हिकारत

अकड में तने हुए कंधों पर लदी यह गरूर की बिसात क्यों है,

अपना करना अपना खाना अपने दर्द अपने ईलाज

अलग रास्ते जुदा जुदा मंजिलें फिर जमीं पर फसाद क्यों है?.

सटटा!!

क्रिकेट के खेल में सटटे की भूमिका कितनी अहम् है यह सभी जानते हैं?,लोगों का स्वभाव है कि वह अपनी तरफ उठी प्रत्येक उंगली को महज आरोप घोषित कर देते हैं लेकिन क्रिकेट में अप्रत्याशित पराजय संदेह के बीज अंकुरित कर देती है,आज भारत और पाकिस्तान मैच इस संदेह की सलीब पर लटका हुआ है,आज समाचार पत्रों ने 2 हजार करोड रूपये का सटटा लगाये जाने की खबरों को प्रकाशित किया है,भारत की टीम हार की कगार पर खडी है,बस औपचारिकता ही शेष है,लोग मैच देख रहे हैं और मैं सटटे के सच को अपने दिमाग में धुन रहा हूं शायद कुछ और लोग भी ऐसा ही कर रहे होंगे?,अनिश्चितता का यह खेल भी एक सटटा ही है इसलिए कहना ही पडेगा कि सटटा तो आखिर सटटा ही है ना?.

||ख्याली पुलाव||

ख्यालों के तालाब में यादों का कमल खिलता है,

दर्द भंवरे की तरह कसकती हुई पंखुडियों पर उडान भरता है,

ठहरे पानी में लहरों की खिलवाड जैसी दस्तक दिल पर,

क्यों उभर आई यकायक एक घुटी घुटी आह लबों पर,

वो दिमागी तालाब के सीने बनता बिगडता चेहरा,

जैसे बांध दिया हो दर्द के जिस्मानी पुतले के सिर पर खामख्याली का सेहरा,

तन्हाईयों की गूंज उठी शहनाई में यह मातम सा क्यों है,

इंसानी पुतलों की बस्त में यहां मेरे जैसा आदम क्यों है,

सवालों की सवालिया बरसात आज इतनी जबरदस्त क्यों है,

दिल की हर उलझन उलझटों में उलझकर आज इतनी बेबस क्यों है,

दिमागी तानपूरे का हर एक तार झंकारी हो उठता है,

वाहः क्या बात है ख्याली पतली में फिर आज पुलाव पकता है।-पीके

||राजशाही||

भारत के लोगों में राजशाही का Virus अभी जिंदा है और वह लोगों की रक्त धमनियों में प्रवाहित हो रहा है उसके प्रभाव से आल्हादित व्यक्ति स्वतः राजवंश के लोगों के कदमों में झुक जाता है,मेरी दृष्टि में यह किसी व्यक्ति विशेष का आदर या सम्मान नहीं है,यह विशुद्ध गुलाम मानसिकता का प्रदर्शन है,जिससे अभी तक भारतीय जनमानस उभर नहीं पाया है,यह चित्र शासक एवम् शासित के मध्य स्थिर सम्बन्ध का परिचायक है,इसी सम्बन्ध का अब शिक्षित वर्ग ने VIP Culture विशिष्टता की संस्कृति नाम दे दिया है,यह संस्कृति मानसिकता का विद्रुप रूप है जिसके अन्तर्गत जो नीचे झुका हुआ है वह उपर नहीं उठना चाहता है और जो झुकाये हुए है वह झुके हुए व्यक्ति को उपर उठाना नहीं चाहता है,यह लोकशाही पर राजशाही का प्रभुत्व है तथा जनवादी व्यवस्था का उपहास भी है।

“खींचतान”

महत्वकांक्षा विवाद की जननी है,वैकल्पिक राजनीति के पुरोधा बनकर केजरीवाल के साथ मैदान में उतरे लोग महत्वकांक्षा के विष को पीकर एक दूसरे के विरूद्ध विषवमन कर रहे हैं यह रवैया पार्टी की साख को बटटा लगा रहा है,हालिया विवाद कुमार विश्वास के ब्यान पर दिलीप पाण्डेय के अनावश्यक सवाल उठाने से पैदा हुआ है,कुमार विश्वास ने कहा था कि वह भाजपा पर निजी हमले करने की जगह जनसंघर्ष पर ध्यान केंद्रित करेंगे,उससे पहले कुमार विश्वास ने संदीप दीक्षित पर सेना प्रमुख पर की गयी टिप्पणी को लेकर तीखा हमला किया था,दिलीप पाण्डेय ने इस बात को पकडकर कुमार विश्वास से सवाल किया था कि वह कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ अलग अलग दृष्टिकोण अपना रहे हैं,यहां यह भी उल्लेखनीय है कि केजरीवाल कैम्प के कुछ लोग पहले से ही कुमार विश्वास की भाजपा से नजदीकी के मुद्दे को हवा देने में लगे हुए थे,उन्होंने दिलीप पाण्डेय की आड लेकर कुमार विश्वास के खिलाफ मुहिम में जान डालकर सोशल मीडिया को लडाई का अखाडा बना लिया है,कुमार विश्वास के समर्थक और विरोधी जो आम आदमी पार्टी से हैं इस समय आमने सामने हैं,पीएम मोदी के विरूद्ध की जाने वाली टिप्पणियों की अति ने केजरीवाल को मोदी फोबिया का मरीज सिद्ध कर दिया था,कुमार विश्वास इस अति का मुखर विरोध करते रहे हैं उनका कहना रहा है कि हमें व्यक्ति/पार्टी केन्द्रित विरोध करने की जगह मुद्दा केंद्रित विरोध/राजनीति करनी चाहिये,इसी वजह से वह इस तरह के ब्यान देकर पार्टी की धारा का मोडने का प्रयास कर रहे थे,वैसे भी प्रत्येक नेता/व्यक्ति अपने स्वभाव/अपने तरीके/अपनी समझ/अपनी सोच से किसी के खिलाफ बोला करता है,इसे निर्देशित नहीं किया जा सकता है लेकिन अब “आप” में मौजूद में कुमार विश्वास का विरोधी गुट कुमार विश्वास की शैली/विचारधारा को स्वनिर्देशित करने की इच्छा से ग्रस्त है,यह नासमझी की खींचतान “आप” की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचा रही है और वैकल्पिक राजनीति देश के सामने प्रस्तुत करने की स्वघोषित पक्षधर “आप” अपने इस दावे को खुद ठेंगा दिखा रही है,यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस संदर्भ में केजरीवाल का मौन आश्चर्य का विषय है।

किसान!!

जिन्दगी मांगते मांगते हुआ बेदम तो मौत का दामन थाम लिया,

गठरी बांधने के लिए उठायी थी जो रस्सी उसी का फंदा बना लिया,

कम्बख्त ये तंगहाली जेब की कंगाली जहर खाने की हसरत को भी ठेंगा दिखाती है,

ये दौरे ऩाकिस है साहेब जो आवाज़े हक़ को भी सियासत मुखालिफाना बताती है,

लो हम तो चले तुम्हारी बपौती बन चुकी धरती का कुछ बोझ कम कर जाते हैं,

मेरी हसरतों की सलीब है तुम्हारी बेपरवाही कुछ जिम्मेदारी कम कर जाते हैं,

ये बेबसी के आगोश लिपटी मेरी हसरतों की शहादत तुम्हारे दामन का दाग बनेगी,

फिजूल नहीं जायेगी कुर्बानी मेरी वक्ते दहलीज पर यही इंकलाबी आग बनेगी।