मायनों की तलाश!

तमाम उम्र की है जिन्दगी के असल मायनों की तलाश

हासिल मगर कुछ मुआयने ही बनकर रह जाया करते हैं।।

समझने की कोशिशें तो करते रहे हैं सारी दुनियां को

बरखे मगर तलाशिया कुछ अधूरे रह ही जाया करते हैं।।

फेहरिस्त बनाकर तय करते हैं लोग दायरे हदे हदिया

मगर बेख्याल परिन्दे दाना चुगकर उड जाया करते हैं।।

बहावी पानी कब देता है दरों दीवारों को इज्जत

तूफां ख्याले समुन्दर क्यों हदों में कैद हो जाया करते हैं।।

कदमों की बिसात से बाहर की बात है पैमाईशे जहां

बेपैर ख्याली कसरतिया उम्दा काम कर जाया करते हैं।।

जितना सोचा उतना उलझा उलझावी मकडजाल में

अच्छे हैं वह बेफिक्रे जो चादर तानकर सो जाया करते हैं।।

ये जमीं वैसी की वैसी ही है आसमां अपनी जगह पर है

क्या क्या तलाशने की खातिर हम कहां खो जाया करते हैं।।

मायनों की बेसिरा बेखात्मा तलाश की चाह में उलझकर

औरों की खातिर एक मुआयना बनकर रह जाया करते हैं।।-PKVishvamitra

पहेली!!

आशा की गोद में खेलती है निराशा

निराशा की गोद में खेलती है आशा

ऐसा सहचारी रिश्ता क्या कहलाता है?.

तोड तोडकर बनाते रहने की लिप्सा

बना बनाकर तोडने रहने की ईप्सा

जोडकर तोडना तोडकर जोडना क्या कहलाता है?,

संघर्षों के कंटकीय पथ की असहनीय वेदना

वो उमडती घुमडती अविरल मानवीय संवेदना

यह वेदनाओं संवेदानाओं का घर्षण क्या कहलाता है?.

परिचय अपरिचय के एक स्वरीय सुर ताल

ज्ञातव्य की ही ज्ञातहीनताओं का मायाजाल

अन्यों से परिचय स्वयं से अपरिचय क्या कहलाता है?.

आया भी हूं और जाऊंगा भी न जाने कहां

कहां से आया हूं और न जाने जाऊंगा कहां

यह आगमन की सत्यता से गूंथा गमन क्या कहलाता है?.-PKVishvamitra

पिता!

यह पिता है जिसके बच्चे के दिल में छेद है और इसका इलाज सरकारी मदद के बिना नहीं हो सकता है,जिस मुख्यमंत्री ने उपहासी उपवास में करोडों रूपये फूंक दिये थे उसने मदद करने से इंकार कर दिया है,इस बच्चे को बचाया जा सकता है,बेबस पिता ने मुझसे सोशल मीडिया पर इसे “आवाज” बनाने की अपील की थी,मैंने यथा संभव प्रयास किया है,क्या आप मानवीय संवेदनाओं का प्रदर्शन करते हुए इसे आवाज बनाकर सरकार के कानों तक पहुंचाने में कोई सहयोग कर सकते हैं?,यदि हां?,तब इस विषय को लेखनी का आश्रय प्रदान कर दीजिये,यह एक अपील है।

ईद!

चलो गले मिलकर ईद मना लेते हैं,

भूलकर तमाम पुराने गिले शिकवे

खो चुकी आदमियत खोज लेते हैं।।

खोलकर हर एक पिंजरे के दरवाजे

फडफडाते बेबस हो चुके परिन्दों को

एक खुला आसमां मुहैय्या करा देते हैं।।

इस जमीन पर बसेरागीर है तंगदिली

हटाकर दीवारें बेबुनियाद रंजिशों की

गजल मिलनसारी की गुनगुनाते लेते हैं।।

पत्थरदिलों के शहर कंक्रीट के जंगल

छोडकर कत्लोगारत के खेल का मैदां

जज्बातिया आदम बस्त बसाते लेते हैं।।

दिल मिलायें मुसाफा मिलायें खुले दिल से

रंजिशों के ख्याली किले कर बिस्मार

असलियत में ही असली ईद मना लेते हैं।।

ये दावते इंसानियत है मेरे अजीज दोस्तों

रहबरे खुदा करीम की राह में खडे होकर

मुक्कम्मले ईमां नेक नीयत ईद मना लेते हैं।।-PkVishvamitra

!!औरत!!

रोटी कपडा और एक अदद आसरे की खातिर

वह बंदिश-औ-गुलामी की कब्र में दफन हो गयी,

सहूलियत की सलीब पर लटकाकर अपना वजूद

बिना मजूरी की घरेलू नौकरानी सी बनकर रह गयी,

रिवाजिया रिश्ते का अजीब सा है एक फरेबी झांसा

जिसमें उलझी इंसानी जिंदगी औरत बनकर रह गयी,

बेजज्बा गरूरों का जिस्मानी बुत बन गया हुक्मरान

वह तो हुक्में गुलाम एक अदद बांदी बनकर रह गयी,

जिन्दगी के असल मायनों में क्या है इंसानी जिन्दगी

तलबे जायका जिन्दगी एक ख्वाहिश बनकर रह गयी,

रिश्ता-ऐ-नाजुक की दहशत रही सिर पर सवार हमेशा

हिदायतें तहज़ीब एक मजबूत दीवार बनकर रह गयी,

समझना था और बांटना था दर्दे सिसक आगे बढकर

उफ!!कम्बख्त बादहू दर्दे ब्यानी सिसककर रह गयी,

औरत ही तो थी औरत ही तो है जिस्मानियां तौर पर

अहसासे वफा चलता फिरता पुतला बनकर रह गयी।-“PKVishvamitra”

अंगार!!

दर्दे भटटी में दहकते गमगीन अंगारे

दरिया-औ-तालाबी आंखों के सहारे

बिनबादल बरसात बनकर बरसते रहे,

मस्त मिजाज कहकहे लगाता मातम

हादसाये जिंदगी की अनकही तफ्सीलें

सुनकर रिवाजिया लोग आते जाते रहे,

आते भी रहे जाते भी रहे लोग बदस्तूर

रस्में हौंसला अफजाई निभाने के लिए

मगर गमें आतिश के अलाव जलते रहे,

वो रहनुमां बनकर थे बिल्कुल सामने

खूब बाहिफ़ाज़ती का दिखावा करते हुए

मगर कुछ लोग लूटते रहे कुछ लुटते रहे,

मौसमें बददिमागी के तूफां ने ही उजाड़ा

हमेशा अमनौ चमन का गुलजार गुलदस्ता

गमजदा हाथ मगर नयी क्यारियां बनाते रहे,

महकती बहकती फिर से आयी फस्ले बहार

जिंदगी में छाये सूनेपन को बुहारने के लिए

सीने में मगर अहसासी अंगार यूंही दहकते रहे।-pkvishvamitra

योग!

बित्ते भर की बिसात गज भर का फुलाव ले गयी,

बालिश्त भर की पैमाईश पाने के लिए योग जरूरी है,

अन्दर होकर कमर से जा चिपका है पेट बनकर चकला,

थोडा सा तो उभार आ जाये इसके लिए भोग जरूरी है,

चेहरा चमकाने के बहानों की तलाश है उसे तो शिद्दत से,

तरकीबे मजमा की खातिर आवाम रोगल होना जरूरी है,

सांसो को चालू रखने की खातिर मांगने लगेंगे रोजी रोटी,

उनके मंसूबों को काबू में करने की खातिर जोग जरूरी है,

हम तल्ख़ बकझकिये तो करते ही रहते हैं तल्ख बकझक,

पटरी पर मजे से दौडती जिन्दगी की खातिर योग जरूरी है।-Pk.

तलाश!!

इंसानी बस्त में भटकते तलबयाफ्ता रूहानी कदमों को,

जिस्मानी पिंजरों में छिपी हुई आदमियत की तलाश है।।

पेट के ज़ाले झाडने की जद्दोजहद में ऊलझे इंसानो को,

इंसानों को ही खाने की भूख लहू पी जाने की प्यास है।।

आईनों की साफ सफाई भुलकर चेहरे की दागदारियों को,

वजूद अपना तलाश नहीं पाये मगर दीदारे रब की आस है!!

दरियाओ तालाब बनाना चाहता है समुन्दर खुद ही खुद को,

शायद उन्हें महज दो बूंद खारे समुन्दरी पानी की तलाश है।।

पुराना पर्दा!

गुस्ताख़ो की जमात ने दीवार पर टंगा हुआ

पुराना पर्दा मानकर बेअदबी से उतार फेंका है,

कल पुराने बेकार सामान के ढेर पर जा गिरना

उन्होंने भी अपना अंजामें नसीब बना लिया है,


!!पैगाम-ऐ-हश्र!!

ये देखो दो रोटी की भीख बनकर झुक गया आसमां उसके सिर पर कुछ ऐसा उसने सोचा होगा

पता नहीं कितने दरवाजे खटखटाकर दुत्कारे जाने के बाद उसने इस खुशनसीबी को खोजा होगा,

उसकी आंखों की ताव ने जताया है राजे मुफलिसी तयशुदा वो कभी अपनी मर्जी का शंहशाह रहा होगा,

ऊफ!! कम्बख्त!! बुढापे की मार पर लदा हुआ औलादे नालायकी बोझ ही उसे इस दोराहे पर लाया होगा,

बचपन की हठीली राजशाही जवानी की शहंशाही से जुडी यादों की गठरी का बोझ उसने कैसे उठाया होगा,

कंपकपाते हाथों से अध चबाई रोटी के निवालों को मुंह में रखकर उसने पेट भरने का फर्ज ही निभाया होगा,

जिंदगी के नाम पर खडखडाती हडडियों के पिंजर में चलती सांसों ने कितनी बार मौत के सामने हाथ फैलाया होगा,

धौंकनी सी चलती उखडी हुई सांसों के दबाव में धुल धुल करते हुए उसने अपना सीना कितनी बार दबाया होगा,

दौरे बदहाली से गुजरते बुढापे को पटककर दरवाजे पर शायद उपर वाले ने पैगामें हश्र मेरे लिए भिजवाया होगा।-Pkvishvamitra.