“चाह”

तराशकर कर हसरतों के ऊंचे पहाड

एक खुशनुमां मूरत बनाना चाहता था।।

काटकर सख्त पत्थरीली चट्टानों को

दरियाये रहमदिल बहाना चाहता था।।

चुभती हैं उजडी क्यारियां आंखों में 

अहदे चमन नूरानी बनाना चाहता था।।

सितारे हैं बोझिल कितने आसमां में

खल्के असल आदम बनाना चाहता था।।

तंगदिली की शिकार हो गयी है दुनियां

गजले मेल मिलाप सुनाना चाहता था।।

कत्लोगारत से दहशतज़दा है हर शख्स

बस्त निजामें अमन बसाना चाहता था।।

डरावने ख्वाबों ने पैदा की हमेशा हौल

ख्वाब कोई खूबसूरत दिखाना चाहता था।।

तमाम जिल्लतें झेलती है अदबे गर्जियत

एक अदद घर वास्ते अदब बनाना चाहता था।।-“PKVishvamitra”

सुकूँ

नहीं दिखा पाऊंगा आज लिखकर

हुनरे हरूफिया जादूगरी मन उदास है।।

शाम-ऐ-जिन्दगी ढल रही है तेजी से

अंधेरी रात आ जाने का अहसास है।।

चांद चकौरी आ खडी हुई मेरे सिरहाने

सूखते हुए हलक में अजीब सी प्यास है।।

चंद ही कदमों का बचा है बाकी सफर

घुटी घुटी ऐ सांसों ये कैसा आभास है।।

दोतरफा लडाई अन्दरूनी बहरूनी भी

ठहर गया वक्ते समुन्दर क्यों हताश है।।

अभी तो बाकी हैं कर्जदारियां काफी

कम्बख्त किताबे बही किसके पास है।।

उधारियां चुकता करने की ख्वाहिशें

रखेंगी अभी जिंदा बाकी ये विश्वास है।।

उलझा है दिमाग जंगे असमंजस में

चंद रोज और जीने की तलबिया आस है।।

सिसक रही है आज अल्फाजिया कंगाली

सचमुच दिले फकीरा आज बहुत हताश है।।

नाउम्मीद है पूरी तरह आज अंदाजे ब्यानी

निगाहें गरीबां को खुद सुकूँ की तलाश है।।-

“PKVishvamitra”

“जुआ”

अरमानों का जुआ खेलते खेलते

लगाई बेशकीमती जिंदगी दांव पर।।

अक्ल पर पड गये बडे बडे पत्थर

कुल्हाडी चला दी हो जैसै पांव पर।।

सनक के घोडे पर था सवार अंधापन

शर्त लगाई आती जाती धूप छांव पर।।

द्रोपदी को तो बाजी में हारना ही था

निगाह जो जम गयी थी पांच गांव पर।।

किस्मत के उलट फेर का खेल है जुआ

लटकी है हमेशा जिंदगी सलीबे दांव पर।।

गांठ थी दिल की खुलते खुलते उलझ गई

चांद सा मुखडा रगडा हो जैसे झांव पर।।-PKVishvamitra

आज की कविता(बुरा मत मानना)

मैं तो दिल खोलकर फेंकता रहा,

वह गर्ज-ऐ-दोस्ती में लपकते रहे।।

ये दोस्ती निभाने की ललक ही थी,

वह बकझक को शायरी मानते रहे।।

क्या क्या फेंक दिया है अल्हड अलमस्त ने,

देखे बिना अनगढ कंकरों को संभालते रहे।।

अल्फाजिया उबलाई बनी थी जो उगलाईयां

रहमें दिल अज़ीज दोस्त उसे शायरी कहते रहे।।

ये सबब है जिगरे यारों की हौसलाअफजाई का

चाहते बेलौस की बारिश में भीगकर बकियाते रहे।।-PKVishvamitra

राग

वेदनाओं की वीणा पर सजाकर

पीडा के सात सुर विरह के गीत।।

झिंगुरों का अनवरत राग अनहद

अतृप्त कामनाओं में निहित प्रीत।।

भाव प्रवणता सुसंगत वाद्ययंत्रक

उन्मुक्त असीमित प्राकृतिक संगीत।।

कलरव करतल साध्य ध्वनि संगत

स्थिरचित विश्रामित रागी मौन मीत।।

नीरसता निर्मित अन्तर्द्वन्द्वीय नीरवता

आन्तरिक कोलाहल एकाकी मनमीत।।-PKVishvamitra

“ख्यालात”

लेता रहा मौसम लगातार बदलावी मिजाज से करवटें

सबकुछ बदल गया आदते सवालात नहीं बदल पाये हैं।।

दिमाग-ऐ-आसमां में कौंधती हैं बदमिजाज बिजलियां

वक्ते जरूरत के मुताबिक ख्यालात नहीं बदल पाये हैं।।

जुस्तजू का रेगिस्तान है सोच के दरिया से भी लम्बा

ठुल्लम-औ-ठुल्ले उम्मीद-ऐ-करामात नहीं बदल पाये हैं।।

आजाद ख्याली के पिंजरे में कैद होती हैं बंदिशे तमाम

तंगदिली के दायरों में सिमटी हवालात नहीं बदल पाये हैं।।

ख्याल की कब्र में सवाल के कफन से लिपटा है मलाल

सच है कि हम सवालात-औ-ख्यालात नहीं बदल पाये हैं।।-PKVishvamitra

बन्दगी!

यह तो है पुरसुकूँ इबारत भी और बुलन्द इमारत भी

मेरे ख्यालिया ख्वाबों की और जुनूनी इरादों की इसे

कहोगे बादहू मौत मेरी मजार तो तकलीफ नहीं होगी।।

हर ख्वाबों ख्याल पाला है जेहनियत की कोख में मैने

पुरकशिश तस्सवुर को संजीदगी से तामीर करते हुए

यकीनन वक्ते रूखस्ती में फिक्रे मश़रूफियत नहीं होगी।।

दुनियां में मौजूद हर एक शह है कैद मेरे दिमागे कब्र में

तज़ुरबातौ अहसास के खजाने हैं असबाबे दौलत मेरी

कसम से सफरे रूहानी में भी कोई कैफियत नहीं होगी।।

जिन्दगी के मायनों में जिन्दगी को जीया है जी भरकर

इंसानी कदौकाठी में पनपाया है पोश़ीदा आदमियत को

तयशुदा रहमें खुदा की हाजिरी में शर्मिन्दगी नहीं होगी।।

हिदायते नस्ल की खातिर मिसले मिसालें कहां हैं कम

किताबाते जिन्दगी के हर एक बरखे पर जिंदगी है दर्ज

नेक नीयती है किश्ती इससे बेहतर कोई बंदगी नहीं होगी।।-‘PKVishvamitra”

नूराकुश्ती!!

छिटकी तो थी चांदनी भी फकीरे आलम के आंगन में

अंधेरों की औकात तौलने की जिद सवार हो गयी थी।।

जूनून की किश्ती खाती रही हिचकोले समुन्दरे जिद में

न जाने कब कैसे उसकी सुबह से आश़नाई हो गयी थी!!

बुजुर्गों ने बताई थी उजाले से अंधेरे की पुश्तैनी दुश्मनी

मगर अंधियारी रात सुबह की पैदाकर्दा मां हो गयी थी।।

नादानी थी उजाले और अंधेरे को आपस में गैर समझना

मेरी आंखों के सामने उनकी भाईबंदी साबित हो गयी थी!!

साबित हुआ था अंधेरा भी उजाले के जैसा ही बाऔकात

मगर हमारी जरूर खुद से खुद कुश्तम कुश्ता हो गयी थी।।

अंधेरे चिढे हुए हैं अब पूरी तरह चांदनी का हाथ थामकर

ऊफ!!कम्बख्त यह तो ऊलजलूल हीलाहवाली हो गयी थी।।-“PKVishvamitra”

प्रवाह

विचारों का अविरल प्रचंड आवेगी उन्मुक्त प्रवाह

तटबंधीय आश्रितता कब स्वीकार किया करता है।।

जलधारा का स्रोत ही हो सकता उसमें सम्मिश्रित

विपरीत स्थिति का वह कहां सम्मान किया करता है।।

अवरोधों की अर्थहीनता का प्रतिपादन है उसका मर्म

दिशा दशा निर्देशन वह कहां अंगीकार किया करता है।।

परम्परागत रूढियों का ध्वस्तिकरण ही है उसका धर्म

परिसीमा के बंधन को वह कहां धारण किया करता है।।

नवसृजित परिकल्पनायें हैं उसकी क्रीडामय योजनायें

नवसंचार हीनता को वह कहां हृदयंगम किया करता है।।

अविरल अनुगमित गति ही तो है उसका स्थायी स्वभाव

किंचितमात्र स्थिर होकर वह कहां विश्राम किया करता है।।-PKVishvamitra

Help Please!एक अपील!

मध्य प्रदेश निवासी सागर मेश्राम के बच्चे की मदद सरकार से उपलब्ध कराने के लिए #HelpSagarMeshram टवीटर ट्रेंड चलाने की योजना बनायी गयी है,आज 9 बजे से यह ट्रेंड शुरू होगा,यदि आप Twitter पर भी है तो नन्हें प्रियांशु की जान बचाने में सहयोग करते हुए अपने कुछ Twitt दान कर दीजिये।